कहां गया जिला अस्पताल का रैन बसेरा ?

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-रैन बसेरा बनवाया गया था मरीजों के तीमारदारों के लिए रात रूकने के लिए
-अब कब्जा है नर्सो व एम्बुलेंस ड्राईवरो का
-गरीब मरीजो के तीमारदार खुले मैदान मे ठिठुरते हुए गुजारते है रात
-मजबूरन धर्मशालाओं और गेस्ट हाउस में लेनी पड़ती है पनाह
झांसी। जिला अस्पताल का रैन बसेरा गायब हो गया है। इसे आसमा खा गया जमीन निगल गई किसी को पता नहीं। खैराती कहे जाने वाले जिला अस्पताल में सरकार ने मरीजों के तीमारदारों को एक और खैरात दी थी, यह खैरात रैन बसेरा के रूप में वर्ष 2010 में दी गई थी। मकसद था कि अस्पताल में भर्ती होने वाले मरीजों के तीमारदार अस्पताल परिसर में ही रात को रूक सके।
लाखों की लागत से झांसी विकास प्रधिकरण ने जिला अस्पताल परिसर में सात-आठ कमरों के रैन बसेरा का निर्माण कराया था। यहां अस्पताल में भर्ती मरीजों के तीमारदारों के लिए निः शुल्क ठहरने की व्यवस्था की गई थी। इतना ही नहीं एक समाज सेवी ने यहां तीमारदारो के लिए रसोई की व्यवस्था की थी। जहां गैस का चूल्हा उपलब्ध था। जहां तीमारदार अपना भोजन तैयार करते थे। इस रैन बसेरा में सभी सुविधाएं उपलब्ध थी। इन सुविधाओं को देखकर इस रैन बसेरा को कब्जाने के लिए जिला अस्तपाल का स्टॉफ ललचा गया। देखते-देखते रैन बसेरा के कक्षो पर एम्बुलेंस ड्राईवरो और नर्सिंग स्टॉफ ने कब्जा करना शुरू कर दिया। शुरू में तो दो-तीन कमरो को कब्जाया गया। जब कोई विरोध नहीं हुआ तो पूरे रैन बसेरा पर अस्पताल के स्टॉफ ने ही कब्जा कर लिया। मजे की बात तो यह है कि रैन बसेरा के कमरो पर कब्जा होता रहा और अस्पताल प्रशासन मूक दर्शक बना देखता रहा। हद तो तब हो गई भवन पर अंकित रैन बसेरा को भी मिटा दिया गया।
अब हालात यह है कि मरीजों के तीमारदारो रात को खुले मैदान या अस्पताल के गलियारो में रात बिताने को मजबूर है। उल्लेखनीय है कि मरीजों के तीमारदारो की सुविधा के लिए 2 अप्रैल 2010 को शासन ने लाखों की लागत से जिला अस्पताल में रैन बसेरा का निर्माण कराया था। जिसका लोकार्पण तत्कालीन जिलाधिकारी राजशेखर ने किया था। महज सात-साल में रैन बसेरा का अस्तित्व ही समाप्त हो गया। आश्चर्य की बात तो यह है कि रैन बसेरा पर अवैध कब्जो की जानकारी अब तक जिला अस्पताल प्रशासन को नहीं है।

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