पुस्तक लेखक को कालजयी बना देती है: नाईक

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राज्यपाल ने बीयू के पूर्व कुलपति प्रो. दुबे की पुस्तक का विमोचन एवं गणेश मंदिर में की पूजा अर्चना
झांसी। किसी भी विषय पर एक तथ्यपूर्ण एवं अच्छी पुस्तक का प्रकाशन समाज के लिए अत्याधिक महत्वपूर्ण होता है। किसी भी विषय पर तथ्य के समावेशन के साथ लिखित पुस्तक इतिहास की धरोहर होती है। यह विचार आज विश्वविद्यालय के कुलाधिपति तथा उत्तर प्रदेश के राज्यपाल राम नाईक ने व्यक्त किए। राज्यपाल आज विश्वविद्यालय के गांधी सभागार में बुन्देलखण्ड विश्वविद्यालय के पूर्व कुलपति एवं वर्तमान में सिद्धार्थ विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. सुरेन्द्र दुबे की अपने झांसी प्रवास के दौरान संपादित पुस्तक ‘मेरी झांसी-एक परिचयात्मक वृत्त’ के लोकार्पण एवं विमोचन के अवसर पर उपस्थित श्रोताओं को संबोधित कर रहे थे। उन्होेंने कहा कि झांसंी की पहचान समस्त भारत तथा विश्व भर में महारानी लक्ष्मीबाई के कारण ही मानी जाती है, परन्तु प्रो. दुबे के द्वारा सम्पादित इस पुस्तक में झांसंी के साहित्यिक, सामाजिक, संास्कृतिक, पत्रकारिता, खेल, खनिज सम्पदा, चित्रकला आदि विभिन्न विषयों के विद्वानों के द्वारा गहन शोध तथा तथ्यों के साथ लिखित एवं सम्पादित पुस्तक है।
श्री नायक ने कहा कि किसी भी लेखक की कृति लेखक की मृत्यु के पश्चात भी उसकी कीर्ति को बनाये रखती है तथा कालजयी बना देती है। उन्होंने कहा कि कुलपति के कर्तव्यों का निर्वहन करते हुए प्रो. दुबे ने झांसंी के बारे में इस प्रकार की पुस्तक की रचना कर डाली यह उनके कार्य के प्रति समर्पण को दर्शाता है।
समारोह की अध्यक्षता करते हुए बुन्देलखण्ड विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. जे.वी. वैशम्पायन ने अतिथियों का स्वागत करते हुए विश्वविद्यालय के पूर्व कुलपति प्रो. दुबे तथा महामहिम राज्यपाल का धन्यवाद किया कि उन्होंने पुस्तक का लोकार्पण बुन्देलखण्ड विश्वविद्यालय में कराने हेतु सहमति प्रदान की है।
इस अवसर पर ‘मेरी झांसी’ पुस्तक के प्रधान सम्पादक विश्वविद्यालय के पूर्व कुलपति प्रो. सुरेंद्र दुबे ने अपनी पुस्तक के संबंध में एक विस्तृत व्याख्यान देते हुए कहा कि कुलपति के रूप में पदभार ग्रहण करते हुए ही उन्होंने सोच लिया था कि वह झांसंी के अकाल पीड़ित तथा सूखाग्रस्त भूभाग के मुहावरे को हटा कर झांसंी के साहित्यिक, सांस्कृतिक एवं सामाजिक विशेषताओं को विश्व पटल पर रखने का प्रयास करेंगे। उन्होंने कहा कि कुलपति के रूप में उनका झांसी प्रवास उनके जीवन का एक महत्वपूर्ण भाग है जिसे वह कभी नहीं भुला सकेंगे। उन्होंने कहा कि अपने कुलपति कार्यकाल के दौरान उन्हें यहां के लोगों, इतिहास, भूगोल, संस्कृति, पत्रकारिता, खनिज सम्पदा तथा विकास में प्रवासियों के योगदान को समझने का मौका मिला इसके लिए वे सदैव यहां के निवासियों के ऋणी रहेगें। प्रो. दुबे ने कहा कि उनके द्वारा सम्पादित यह पुस्तक उनके उसी स्वप्न का प्रतिफल है।
प्रो. दुबे के द्वारा सम्पादित इस पुस्तक में अन्तर्राष्ट्रीय बौद्ध संस्थान के अध्यक्ष हरगोविन्द कुशवाहा, यशोवर्द्धन गुप्त, पत्रकार अयोध्या प्रसाद ‘कुमुद’, विश्ववि़द्यालय के पूर्व प्रति कुलपति प्रो. श्रीराम अग्रवाल, सेवानिवृत्त प्राचार्य प्रो. के.बी.एल. पाण्डेय, पर्यटन एवं होटल प्रबन्धन संस्थान में आचार्य प्रो. प्रतीक अग्रवाल, समाज सेविका डा. नीति शास्त्री, वरिष्ठ बुन्देली साहित्यकार पन्नालाल असर, हिन्दी विभागाध्यक्ष डा. मुन्ना तिवारी व सह आचार्य डा. पुनीत बिसारिया, बाबू जगजीवन राम विधि संस्थान में सहायक आचार्य डा. नीता यादव, डा. मधु श्रीवास्तव, भास्कर पत्रकारिता एवं जनसंचार संस्थान में कार्यरत उमेश शुक्ल की रचनाओं को समाहित किया गया है।
समारोह का प्रारम्भ राष्ट्रगीत के गायन से हुआ तत्पश्चात मंचासीन अतिथियों के द्वारा मां सरस्वती तथा महारानी लक्ष्मीबाई के चित्र के समक्ष दीप प्रज्जवलन, माल्यार्पण तथा पुष्पार्चन से हुआ। इस अवसर पर बुन्देलखण्ड विश्वविद्यालय के कुलगीत का गीत भी गायन किया गया। कुलपति प्रो. वैशम्पायन ने मुख्य अतिथि तथा विशिष्ट अतिथियों को पुष्पगुच्छ भेंट कर सम्मानित भी किया। कार्यक्रम के अन्त में आमंत्रित अतिथियों को शाॅल, श्रीफल तथा स्मृति चिन्ह भेंट किये। महामहिम राज्यपाल द्वारा विश्वविद्यालय के एन.सी.सी कैडैट्स की सलामी गारद का भी निरीक्षण किया गया। संचालन डा. पुनीत बिसारिया ने तथा कुलसचिव नारायण प्रसाद ने सभी का आभार व्यक्त किया।
इस अवसर पर विधायकगण जवाहर राजपूत, बिहारी लाल आर्य, विधान परिषद सदस्या श्रीमती रमा आर.पी. निरंजन, महापौर रामतीर्थ सिंघल, पूर्व मंत्री रविन्द्र शुक्ल, कला समीक्षक एवं समाजसेवी मुकुन्द मेहरोत्रा, वरिष्ठ साहित्यकार त्रिभुवननाथ त्रिवेदी, जिलाधिकारी शिवसहाय अवस्थी, वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक व अन्य प्रशासनिक अधिकारियों के साथ साथ बुन्देलखण्ड विश्वविद्यालय के प्रो. वी.के. सहगल, संकायाध्यक्ष विज्ञान प्रो.एम.एम. सिंह, प्रो. सुनील काबिया, प्रो. सी.बी. सिंह, प्रो. एस.के. कटियार, प्रो. अपर्णा राज, प्रो. पूनम पुरी, प्रो. अर्चना वर्मा, प्रो. आर.के. सैनी, प्रो. एस.पी. सिंह, डाॅ. डी.के. भट्ट, डाॅ. सुनील त्रिवेदी, डाॅ. अनु सिंघला, वीरांगना राजकीय महिला महाविद्यालय के प्राचार्य डाॅ. बी.बी.त्रिपाठी, बुन्देलखण्ड महाविद्यालय के प्राचार्य डाॅ. बाबूलाल तिवारी, हरि त्रिपाठी आदि उपस्थित रहे।
इसके पूर्व श्री नाईक ने महानगर के ऐतिहासिक गणेश मंदिर में भक्त निवास के लोकार्पण उपरांत मंदिर में स्थापित भगवान गणेश की पूजा-अर्चना की। उन्होंने भक्त निवास में सहयोग देने वाले लोगों को सम्मानित किया। उन्होंने कहा कि वह यहां कई बार आये हैं, लेकिन इस ऐतिहासिक मंदिर में दर्शन व पूजा-अर्चना करने वह पहली बार आये हैं। मराठा शासकों द्वारा निर्मित यह मंदिर स्वतंत्रता संग्राम की महान योद्धा महारानी लक्ष्मीबाई के विवाह का साक्षी है। महारानी लक्ष्मीबाई इस मंदिर में पूजा-अर्चना करने आती थीं। इस मौके पर महाराष्ट्र गणेश मंदिर कमेटी के कार्यकारी अध्यक्ष राजीव इन्द्रापुरकर, बसंत मोहे, नरेन्द्र लुखे, किशोर कुमार पाल सहित मराठी समाज के गणमान्य नागरिक मौजूद रहे। राज्यपाल ने इस मंदिर में 1 घंटे से अधिक समय व्यतीत किया।

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